Monday, 7 November 2016

वजूद 


एक वजूद ही तो था 

ता उम्र जिसके पीछे मैं चलता रहा

हाथ मे उँगली पकड                                                           

Related imageइस उम्मीद से ही तो ज़िन्दगी से मिलता रहा!
                                                                                          

जुड़ रहा था रफ़्तार से हर रोज़ एक नया पन्ना  

के खुद  को ही पढ़ना भूल गया

खुली द्वात मे पड़ी उस कलम से

जाने क्यूँ लिखना भूल गया!


मुड़ने लगे है अब वो पत्ते भी

जो टहनी से टूट बिखरे थे

रास्तो के सूने पन को

जाने वो क्यूँ इस तरह से भर रहे थे!

 

खुला  हो आसमान जितना भी

कोई किनारा तो उसका भी होगा

तेरी झुकती पलकों का सवेरा कहीं तो होगा!


 यूँ ही नहीं बदलती मंज़िले

अक्सर मुकाम पर आकर

वरना  रास्तों पर राही

कोई मिला ना होता!

उस सुखी रेत पर 

आज कोई निशान बना ना होता !!


ना बोल थे, ना थी कोई आवाज़

बस मैं सुनता ही गया

दूर टूटी उस हंसी की छनकार!


रस्ते पर चलते हर शक्श मे

जाने क्यूँ तूझको तक रहे थे

खूली आँखों से मानो इक नया ख्वाब बून रहे थे !!


क्या होता है हर चीज़ का जवाब वक़्त के पास

या हम यूँ ही ज़िन्दगी बसर कर रहे थे

खाली कटोरी मे पड़ रही उस चाँदनी को मानो

दिन मे भी तक रहे थे!   

ज़िन्दगी से कुछ इस  तरह गुफ़्तगू कर रहे थे ! (२ )                                                                                                                                                                          स्मृति ठाकुर