सोच से दूर एक ख्याल था
जाने ये कैसा सवाल था !
चल रहा था वक़्त ऐसे
जैसे खुद ही वो एक जवाब था!
गुज़र रही थी रोशनी, अंधेरो से ऐसे
जैसे सुबह का इसको इंतज़ार था!
खमोश पानी में मानो
उठता सैलाब सा!
रेत में चमक थी मगर
पर वो गीली 'जमीन' न थी
घर में खुली खिडकिया थी मगर
वो खील-खिलाती हंसी न थी
वो खील-खिलाती हंसी न थी
बहती नदी में मानो
वो हलचल न थी!
सफर तो लंबा था मगर
साथ कोई हस्ती न थी
आईने में तस्वीर हम पर
हंसती सी थी!
जैसे दीवारों पर लिखी कहानी
हमसे मिलती न थी!
ज़िन्दगी, ज़िन्दगी सी लगती न थी
पक्षियों की उड़ान कही रुकती न थी!
हवा तो तेज़ थी हर तरफ
पर पतंग उड़ती न थी
घर के उस कोने में मानो
तेरी कमी खलती सी थी
ज़िन्दगी, ज़िन्दगी सी लगती न थी! स्मृति ठाकुर


