Monday, 7 November 2016
Friday, 16 September 2016
सोच से दूर एक ख्याल था
जाने ये कैसा सवाल था !
चल रहा था वक़्त ऐसे
जैसे खुद ही वो एक जवाब था!
गुज़र रही थी रोशनी, अंधेरो से ऐसे
जैसे सुबह का इसको इंतज़ार था!
खमोश पानी में मानो
उठता सैलाब सा!
रेत में चमक थी मगर
पर वो गीली 'जमीन' न थी
घर में खुली खिडकिया थी मगर
वो खील-खिलाती हंसी न थी
वो खील-खिलाती हंसी न थी
बहती नदी में मानो
वो हलचल न थी!
सफर तो लंबा था मगर
साथ कोई हस्ती न थी
आईने में तस्वीर हम पर
हंसती सी थी!
जैसे दीवारों पर लिखी कहानी
हमसे मिलती न थी!
ज़िन्दगी, ज़िन्दगी सी लगती न थी
पक्षियों की उड़ान कही रुकती न थी!
हवा तो तेज़ थी हर तरफ
पर पतंग उड़ती न थी
घर के उस कोने में मानो
तेरी कमी खलती सी थी
ज़िन्दगी, ज़िन्दगी सी लगती न थी! स्मृति ठाकुर
Wednesday, 14 September 2016
ख्याल कुछ इस तरह
ख्याल कुछ इस तरह से था
के शोर में भी कुछ सुनता ना था
टेबल पर गिरती परछाई में मानो
मैं कुछ बुनता सा था |
रौशनी तो थी मगर
पर कुछ दिखता ना था
तेरे ना होने पर भी
तू कुछ दिखता सा था |
क्या शक्ल दे तुझे
हर वक़्त तू मिलता सा था
होने का तेरे सबूत मुझसे
कुछ सवाल ऐसा तूने पूछा सा था |
क्या जवाब देते
इतना तो मालूम न था
पर साथ मेरी परछाई के
तू करीब चलता सा था |
स्मृति ठाकुर
जिंदगी
देखना कंही अँधेरी रात ‘धुंदली’ पड़ न जाए
‘कमी’ पड़ न जाए |
ये तो पन्ने है जिंदगी के
ध्यान रखना, मेरे ‘अक्स’ की
कंही तस्वीर बन न जाए ||
स्याही का रंग गहरा हो जितना
पानी वक़्त का बिखर ही जाता है |
माचिस की एक तीली से
आशियाना जल ही जाता है |
न रूठ इससे
ये तो सिर्फ एक करवट है जिंदगी की
वर्ना तूफानों में भी
दीया जल ही जाता है ||
घिसी थी कलम सलवट से इस कदर
की खुशबु अक्षरों की अब हवा में आती है
तेरे पांव की मिट्टी
ताक पर पड़ी मटकी में नज़र आती है |
न सुनना कभी उस “कैसिट” को
जन्हा जिंदगी गीतों को
लफ्ज़ देती नज़र आती है |
तेरे पांव की मिट्टी उड़ कर, मेरे घर को आती है
जिंदगी, जिंदगी से मिलती नज़र आती है ||
स्मृति ठाकुर
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