रास्तों से कुछ यूं उलझ सी गई है जिंदगी
के हर सफर अब ना खत्म होता राब्ता सा लगे!
जो पहुंचा है मंजिलों तक
अब उनकी दास्तां ही काफी है
कौन कहता है यह जिंदगी सिर्फ उम्मीद पर ही बाकी है?
बहुत मशहूर है कुछ किस्से ऐसे
सांस लेती जिनसे, खामोशिया हैं
चलो यादों की गलियों में अतीत को फिर से बनाते हैं
बिखरी उन कहानियों को नए अंदाज़ सिखाते हैं !
बहुत खूबसूरत हैं वो
ये एहसास उनको फिर से कराते हैं
भीगे कुछ पन्हो को धूप में सुखाते हैं !
जिंदगी की ओर फिर एक बार मुस्कुराते हैं
यादों को जीने का, एक ढंग बनाते हैं,
चलो यादों की गलियों में अतीत को फिर से बनाते हैं!
स्मृति ठाकुर