Wednesday, 7 March 2018
Saturday, 3 March 2018
आज का दौर
कितनी खाली हो गई है ज़िन्दगी
के इसको सामानों से भरना पड़ता है
ऐसे तो हंसने को चार पांच दोस्त है मेरे
पर मन हल्का अकेले में करना पड़ता हैं !
ऊँची बहुत हो गई है दीवारे
के अब खुला आसमान नहीं दिखता
अब मेरे घर से वो चौडा मैदान नहीं दिखता !
ख्वाइशों ने थाम लिया है दामन वक़्त का
के अपनों के लिए समय नहीं निकलतI
अब एक छत के निचे
पूरा परिवार नहीं मिलता !
एक अजीब सी कशमकश में है इंसान
के सब कुछ होते हुए भी
उसे कुछ नहीं मिलता
और इस बात का उसको
कोई हल नहीं मिलता (२) ! स्मृति
साथ आज भी हैं...
कुछ टूटा था उस दिन
के गूँज उसकी कानो में आज भी है
हर ज़र्रे को मानो
तेरी तलाश आज भी है!
छुप कर देखता है आज भी वो कोना
क्या वो झलक आज भी है
बन्द दरवाजो में रोशनी तेरी
चमकती आज भी है!
एक अजीब सा सिलसिला था वो भी
बात तो कोई थी नहीं
पर बातें याद आज भी है
तेरी हलकी हलकी सी वो हंसी
मेरे लबों पर सजी सी है!
इक अजीब सा सकूँ था उस वक़्त में
जिसका हाथ थामे चलते हम आज भी है
कुछ देर के लिए ही सही स्मृति
तेरा वो वक़्त मेरा आज भी है !
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