Thursday, 20 October 2022

 रास्तों से कुछ यूं उलझ सी गई है जिंदगी

 के हर सफर अब ना खत्म होता राब्ता सा लगे!


जो पहुंचा है मंजिलों तक 

अब उनकी दास्तां ही काफी है

कौन कहता है यह जिंदगी सिर्फ उम्मीद पर ही बाकी है?

बहुत मशहूर है कुछ किस्से ऐसे 

सांस लेती जिनसे, खामोशिया हैं 

Monday, 18 April 2022

 पहले जो सामने हैं उसे थोड़ा ओर तक लूँ            

वक़्त के पहिये को रोक कुछ देर

तेरे अक्स को गढ़ लूँ

सूरत ना हो जिस इश्क़ की कोई

उम्मीद के लिबास से मैं उसको ढक लूँ

आईना ना हो जिस चेहरे का कोई

तू कहे तो रंगों से उसको भर दूंगा

पर पहले जो सामने हैं उसे थोड़ा ओर तक लूँ !

 

                                                                                                            स्मृति ठाकुर