रास्तों से कुछ यूं उलझ सी गई है जिंदगी
के हर सफर अब ना खत्म होता राब्ता सा लगे!
जो पहुंचा है मंजिलों तक
अब उनकी दास्तां ही काफी है
कौन कहता है यह जिंदगी सिर्फ उम्मीद पर ही बाकी है?
बहुत मशहूर है कुछ किस्से ऐसे
सांस लेती जिनसे, खामोशिया हैं
वक़्त के पहिये को रोक कुछ देर
तेरे अक्स को गढ़ लूँ
सूरत ना हो जिस इश्क़ की कोई
उम्मीद के लिबास से मैं उसको ढक लूँ
आईना ना हो जिस चेहरे का कोई
तू कहे तो रंगों से उसको भर दूंगा
पर पहले जो सामने हैं उसे थोड़ा ओर तक लूँ !
स्मृति ठाकुर