Sunday, 31 December 2017



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यूं गुजरा वक्त के हम रोक  ही न पाए

सामने ही था सब कुछ 

बस हम समझ ही न पाए !


काफिले तो काफी थे लेकिन 

हम कहीं रुक न पाए 

टूटने का डर था इतना 

की किसी से जुड़ न पाए !


खामोशियों को हाथ में लेकर 

आज सजा दिया था दीवारों पर

लेकिन बारिश तेज़ थी इतनी 

के रंगो को  समेट न पाए !


फिर भी चमकती है चांदनी

ओढ़े रात की चादर 

के कहीं उसके सितारे 

कोई गिन न पाए !                                        स्मृति ठाकुर 


Friday, 10 November 2017

समझ 

समझ कर भी, नासमझी में अगर कोई भूल हो जाए 

कागज पर बनी लकीर अगर धुंधली पड़ जाए 

तो वक़्त का एक पन्न पीछे मोड़ लेना 

गुलदान में बिखरी उन पंखुड़ियों को 

तुम समेट लेना!


माना हम बदलती सी तस्वीर है ग़ालिब

 तुम हया का शीशा तोड़ न देना

इस खूबसूरती की कमियों के राज़ 

तुम खोल न देना !


पास रखना इतना 

कि दूरियां नज़दीकियों के कदम चूम न पाए 

गीले पैरों के निशान

धूप में सूख न पाए !                                                        स्मृति ठाकुर 

उम्मीद 



अच्छा होता है कहीं बार कुछ न कहना 

अच्छा होता है कहीं बार कहानी को अधूरा ही छोड़ देना 

क्योंकि इसमें उम्मीद होती है 

जो जीने के लिए काफी होती है !


सोचो जरा अगर ये उम्मीद न होती 

गीले बरतनों में पानी की कोई बून्द न होती 

सूख जाती गीली जमीन भी बारिश में 

ओर पानी में दिखती कोई तस्वीर न होती !


जरुरी होता है अक्सर चीज़ो का टूट जाना 

जरुरी होता है अक्सर मिलकर बिछड़ जाना 

वरना धूप की क़ीमत सरदी में न होती 

बरसात के बाद फूलों की रंगत ओर हसीन न होती !


ये बस एक उम्मीद ही तो  हैं 

जो जोड़े दर्द को एक पल की राहत से है 

वो बस कुछ लम्हे ही तो है 

जो बंधे अधूरी कहानियों को है 

क्योंकि इसमें एक उम्मीद होती है 

जो जीने के लिए काफी होती है !                                        स्मृति ठाकुर