* कभी फुरसत मिली तो बांटेगे
उन खामोशियों का शोर
जो अक्सर जिक्र तेरे
न होने का किया करती थी
उस ज़िन्दगी को तलाश लू जो
मुझमे छुपकर बैठी थी कही!
*गुजरती है हर शाम सहर सी
तो गुजर जाने दे ग़ालिब
कौन बैठा हैं इंतजार में तेरी?
वफ़ा लेके!
* चंद लफ़्ज़ों में कैसे लिखूं ?
वो दास्ताएं इश्क़
जो बहुत से दिलों में महफूज थी!
* जब तक मैं खामोश हूँ
है महफूज वो तेरा इश्क़ जो
तुझे कभी हुआ ही नहीं! (स्मृति ठाकुर)