Friday, 25 June 2021



 * कभी फुरसत मिली तो बांटेगे 

   उन खामोशियों का  शोर 

   जो अक्सर जिक्र तेरे 

  न होने का किया करती थी 

Friday, 11 June 2021

 



* इस आसमान को तेरी ही जमीन की ख्वाहिश थी

 बरसने के लिए!


* तुम दिल में हो 

 धड़कन में नहीं!

 ये किस्सा तो बहुत आम हैं जनाब 

आँखों पर पड़े पर्दे को जरा  

हल्के से तो उठाईये !


* आँखे इतनी खाली हो गई हैं की 

    के अब कोई सपना भी 

   किराये पर नहीं मिलता!                                         (स्मृति ठाकुर) 

Thursday, 10 June 2021



 कभी वक़्त ठहर गया ओर कभी हम ये सोच कर 

के अब कौन सा मोड़ आना था?

परिंदों को भी उड़ने का शायद अब

न कोई बहाना था!


ज़िन्दगी अभी बाकि हैं ग़ालिब! ये तो मालूम था 

पर अब सवाल ये था के, क्या वैसी ही कहानी थी?

या फिर, ना ये तेरी, ना ये मेरी 

ये बड़ी बेगानी सी थी! 

                                                                  (स्मृति ठाकुर)

 * कुछ पल के लिए ही सही 

   उस ज़िन्दगी को तलाश लू जो 

   मुझमे छुपकर बैठी थी कही!


*गुजरती है हर शाम सहर सी 

  तो गुजर जाने दे ग़ालिब 

  कौन बैठा हैं इंतजार में तेरी?

  वफ़ा लेके!


* चंद लफ़्ज़ों में कैसे लिखूं ?

   वो दास्ताएं इश्क़ 

   जो बहुत से दिलों में महफूज थी!                                       


* जब तक मैं खामोश हूँ 

   है महफूज वो तेरा इश्क़ जो 

   तुझे कभी हुआ ही नहीं!                                (स्मृति ठाकुर) 







 



तेरी चाहत को मैं


कलम पे तो उतार लूं


तू मिल जाएं तो


पूरी काएनात को तराश दूँ!


पूरा हो जहान में  ऐसा ख़्वाब हैं कहाँ ?


जरा रुक कर  में उसकी सूरत तो निहार लूँ


तेरी इश्क़ की उस दास्तान को


चलो आज मैं एक नाम दूँ !

                                                (स्मृति ठाकुर)