वक़्त के पहिये को रोक कुछ देर
तेरे अक्स को गढ़ लूँ
सूरत ना हो जिस इश्क़ की कोई
उम्मीद के लिबास से मैं उसको ढक लूँ
आईना ना हो जिस चेहरे का कोई
तू कहे तो रंगों से उसको भर दूंगा
पर पहले जो सामने हैं उसे थोड़ा ओर तक लूँ !
स्मृति ठाकुर