ख्याल कुछ इस तरह
ख्याल कुछ इस तरह से था
के शोर में भी कुछ सुनता ना था
टेबल पर गिरती परछाई में मानो
मैं कुछ बुनता सा था |
रौशनी तो थी मगर
पर कुछ दिखता ना था
तेरे ना होने पर भी
तू कुछ दिखता सा था |
क्या शक्ल दे तुझे
हर वक़्त तू मिलता सा था
होने का तेरे सबूत मुझसे
कुछ सवाल ऐसा तूने पूछा सा था |
क्या जवाब देते
इतना तो मालूम न था
पर साथ मेरी परछाई के
तू करीब चलता सा था |
स्मृति ठाकुर

No comments:
Post a Comment