Wednesday, 14 September 2016

जिंदगी
देखना कंही अँधेरी रात ‘धुंदली’ पड़ न जाए
उगते सूरज की रोशनी में                                              
‘कमी’ पड़ न जाए |
ये तो पन्ने है जिंदगी के
ध्यान रखना, मेरे ‘अक्स’ की
कंही तस्वीर बन न जाए ||

स्याही का रंग गहरा हो जितना
पानी वक़्त का बिखर ही जाता है |
माचिस की एक तीली से
आशियाना जल ही जाता है |
न रूठ इससे
ये तो सिर्फ एक करवट है जिंदगी की
वर्ना तूफानों में भी
दीया जल ही जाता है ||

घिसी थी कलम सलवट से इस कदर
की खुशबु अक्षरों की अब हवा में आती है
तेरे पांव की मिट्टी
ताक पर पड़ी मटकी में नज़र आती है |
न सुनना कभी उस “कैसिट” को
जन्हा जिंदगी गीतों को
लफ्ज़ देती नज़र आती है |
तेरे पांव की मिट्टी उड़ कर, मेरे घर को आती है
जिंदगी, जिंदगी से मिलती नज़र आती है ||                                                  



स्मृति ठाकुर 

1 comment:

  1. जन्हा जिंदगी गीतों को
    लफ्ज़ देती नज़र आती है |......waah

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