Sunday, 31 December 2017



... 

यूं गुजरा वक्त के हम रोक  ही न पाए

सामने ही था सब कुछ 

बस हम समझ ही न पाए !


काफिले तो काफी थे लेकिन 

हम कहीं रुक न पाए 

टूटने का डर था इतना 

की किसी से जुड़ न पाए !


खामोशियों को हाथ में लेकर 

आज सजा दिया था दीवारों पर

लेकिन बारिश तेज़ थी इतनी 

के रंगो को  समेट न पाए !


फिर भी चमकती है चांदनी

ओढ़े रात की चादर 

के कहीं उसके सितारे 

कोई गिन न पाए !                                        स्मृति ठाकुर 


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