...
यूं गुजरा वक्त के हम रोक ही न पाए
सामने ही था सब कुछ
बस हम समझ ही न पाए !
काफिले तो काफी थे लेकिन
हम कहीं रुक न पाए
टूटने का डर था इतना
की किसी से जुड़ न पाए !
खामोशियों को हाथ में लेकर
आज सजा दिया था दीवारों पर
लेकिन बारिश तेज़ थी इतनी
के रंगो को समेट न पाए !
फिर भी चमकती है चांदनी
ओढ़े रात की चादर
के कहीं उसके सितारे
कोई गिन न पाए ! स्मृति ठाकुर
No comments:
Post a Comment