Friday, 10 November 2017

समझ 

समझ कर भी, नासमझी में अगर कोई भूल हो जाए 

कागज पर बनी लकीर अगर धुंधली पड़ जाए 

तो वक़्त का एक पन्न पीछे मोड़ लेना 

गुलदान में बिखरी उन पंखुड़ियों को 

तुम समेट लेना!


माना हम बदलती सी तस्वीर है ग़ालिब

 तुम हया का शीशा तोड़ न देना

इस खूबसूरती की कमियों के राज़ 

तुम खोल न देना !


पास रखना इतना 

कि दूरियां नज़दीकियों के कदम चूम न पाए 

गीले पैरों के निशान

धूप में सूख न पाए !                                                        स्मृति ठाकुर 

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