कभी वक़्त ठहर गया ओर कभी हम ये सोच कर
के अब कौन सा मोड़ आना था?
परिंदों को भी उड़ने का शायद अब
न कोई बहाना था!
ज़िन्दगी अभी बाकि हैं ग़ालिब! ये तो मालूम था
पर अब सवाल ये था के, क्या वैसी ही कहानी थी?
या फिर, ना ये तेरी, ना ये मेरी
ये बड़ी बेगानी सी थी!
(स्मृति ठाकुर)

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