आज का दौर
कितनी खाली हो गई है ज़िन्दगी
के इसको सामानों से भरना पड़ता है
ऐसे तो हंसने को चार पांच दोस्त है मेरे
पर मन हल्का अकेले में करना पड़ता हैं !
ऊँची बहुत हो गई है दीवारे
के अब खुला आसमान नहीं दिखता
अब मेरे घर से वो चौडा मैदान नहीं दिखता !
ख्वाइशों ने थाम लिया है दामन वक़्त का
के अपनों के लिए समय नहीं निकलतI
अब एक छत के निचे
पूरा परिवार नहीं मिलता !
एक अजीब सी कशमकश में है इंसान
के सब कुछ होते हुए भी
उसे कुछ नहीं मिलता
और इस बात का उसको
कोई हल नहीं मिलता (२) ! स्मृति
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